मूली और गाजर भारत के लगभग हर क्षेत्र में उगाए जाते हैं। गाजर कंद अच्छी तरह से सब्जियों के अलावा अचार और मिठाई बनाने के लिए जाना जाता है। प्रोटीन, वसा और चीनी के अलावा, गाजर खनिजों में समृद्ध हैं। गाजर कंद कैरोटीन नामक वर्णक से भरपूर होता है। यह विटामिन ए से भरपूर होता है जो लीवर के लिए बहुत जरुरी होता है। शरीर को स्फूर्ति प्रदान करने के लिए गाजर का सूप सर्वोत्तम साबित हुआ है।

इसके अलावा, इसकी पत्तियाँ प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भी भरपूर होती हैं और इन्हें पशु आहार के लिए उत्कृष्ट भोजन माना जाता है। यह पशु को स्वस्थ बनाता है और अधिक दूध दे सकता है। भारत में, गाजर की खेती उत्तर भारत के राज्यों में अधिक प्रचलित है और बाकी राज्यों में और गुजरात में मुख्य रूप से पाटन, अहमदाबाद, खेड़ा, मेहसाणा, भावनगर के क्षेत्रों में होती है।

भारत में मूली की खेती उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को छोड़कर हर राज्य में कम होती है, जबकि गुजरात में, मूली की खेती खेड़ा, मेहसाणा, अहमदाबाद और अन्य जिलों में कम-ज़्यादा होती है।

गाजर-मूली के लिए अनुकूल मिट्टी और जलवायु

गाजर और मूली की फसलें अच्छी तरह से सुखी, गहरी नाली वाली और दोमट मिट्टी वाली जमीन अनुकूल होती हैं। भारी मिट्टी के साथ-साथ अधिक अम्लीय मिट्टी इस फसल के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं लेकिन उच्च पोटेशियम युक्त मिट्टी इस फसल के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं। ये फसल सर्दियों के मौसम में लिया जाता है। इस फसल को ठंड और शुष्क मौसम ज़्यादा अनुकूल हैं।

मूली की फसल 10 से 15 सेल्सियस तापमान में अच्छी होती है। गाजर की फसल के लिए 15 से 20 सेल्सियस तापमान अधिक अनुकूल होता है। इस तापमान पर, गाजर कंद का रंग बहुत अच्छा होता है, लेकिन उच्च या निम्न तापमान पर, कंद का रंग पीला रहता है।

गाजर की उन्नत किस्में

रंग के आधार पर गाजर को दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है, एशियाई और यूरोपीय।

पूसा केसर

गाजर की किस्म एशियाई (स्थानीय लाल) और यूरोपीय (नैन्टिस हाफ) किस्मों के संकर से बनाई गई है। कंद गहरे लाल, धारदार, पीले, पतले, रंग के और कम शाखाओं वाले होते हैं। कंद कैरोटीन में उच्च होते हैं। कंद 80 से 90 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं।

नांटिस

कंद नारंगी रंग का, बेलनाकार, पतला, बिना किनारों वाला और स्वाद में मीठा होता है।

ऐंटीनी

कंद गहरे लाल रंग नारंगी के जैसे , आकार में शंक्वाकार और बिना किनारी के होते हैं। कंद 120 दिनों में तैयार हो जाते हैं। इसके अलावा, गोल्डन हार्ट और कश्मीरी ब्यूटी जैसी अन्य किस्में भी उपलब्ध हैं।

मूली की महत्वपूर्ण किस्में

मूली किस्मों को उनके कंद, आकार, रंग, तीखेपन के आधार पर और उन्हें कब तक खाया जा सकता है उस आधार पर वर्गीकृत किया जाता है । भारत में ये किस्में अधिक प्रचलित नहीं हैं। मूली का राउंड रैपिड रेड किस्म 25 दिनों में तैयार हो जाता है जबकि व्हाइट आईसाइकल 30 दिनों में तैयार हो जाता है। पूसा देसी, पूसा रश्मि, पूसा हिमानी, पूसा चेतकी जैसी किस्मों की सिफारिश की जाती है।

मिट्टी की तैयारी और बुआई

जमीन को 20 से 25 सेमी जितनी गहरी जुताई करके, जमीन को समतल बनायीं जाती हैं, फिर उपयुक्त आकार के क्यारे बनाये जाते हैं और उसमें मूली और गाजर के बीज बोए जाते हैं।

बीज दर

8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर का उपयोग गाजर और मूली लगाने के लिए किया जाता है।

सिंचाई और निराई

मूली और गाजर में बुवाई के तुरंत बाद पहली बुवाई और दूसरी सिंचाई 4 से 6 दिनों के बाद और फिर आवश्यकतानुसार मिट्टी के प्रकार और मौसम के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। जरूर के अनुसार दो से तीन बार आंतरखेड करनी चाहिए।

छंटाई

बुआई के 90 से 110 दिनों में गाजर की फसल तैयार हो जाती है। दोनों फसल की छंटाई के दो-तीन दिन पहले दोनों फसलों की सिंचाई करने से जमीन नम और मुलायम हो जाती है। ताकि उठाने में आसानी रहे। मूली की फसल 40 से 45 दिनों में तैयार हो जाती है।

उत्पादन

प्रति हेक्टर गाजर का उत्पादन 30000 किलोग्राम होता है और मूली का उत्पादन प्रति हेक्टर 15 से 20 हजार जितना होता है।

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